कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, धान, गेहूं और गन्ने जैसी पारंपरिक फसलों में मुनाफा सीमित होता है। यदि किसान कम समय में अधिक पैसा कमाना चाहते हैं, तो उन्हें सब्जी फसलों की ओर रुख करना चाहिए। जनवरी और फरवरी का समय कुछ चुनिंदा सब्जियों की बुवाई के लिए सबसे उत्तम माना गया है। सही प्रबंधन और अच्छी किस्म के बीजों का चुनाव करके किसान एक एकड़ खेत से २ से ३ लाख रुपये तक का मुनाफा कमा सकते हैं।
ग्वार फली को अक्सर किसान हल्के में लेते हैं, लेकिन बाजार में इसकी मांग और कीमत हमेशा ऊंची बनी रहती है। जनवरी में बुवाई करने पर शुरुआती बाजार भाव १०० से १२० रुपये किलो तक मिल सकते हैं। इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम मिट्टी की उर्वरा शक्ति (Fertility) बढ़ाता है। इसे एक बार लगाकर अगस्त महीने तक लगातार तुड़वाई की जा सकती है, जिससे लंबे समय तक आय सुनिश्चित होती है।
भिंडी की फसल को गर्मियों के मौसम के लिए सबसे भरोसेमंद माना जाता है। उत्तर भारत में २० जनवरी के बाद इसकी बुवाई की जा सकती है। बुवाई के ५०-५५ दिनों बाद उत्पादन शुरू हो जाता है। शुरुआत में ५० से ७० रुपये प्रति किलो के भाव मिलने की संभावना रहती है। यदि फसल का सही प्रबंधन किया जाए, तो भिंडी से ६ से ७ महीने तक लगातार उत्पादन लिया जा सकता है, जो किसानों के लिए निरंतर आय का स्रोत बनती है।
बेलवर्गीय फसलों में तोरई और करेला अत्यधिक मुनाफे वाली फसलें हैं। तोरई की खेती में अन्य सब्जियों की तुलना में खर्च बहुत कम आता है और बीमारियां भी कम लगती हैं। वहीं, करेला एक ऐसी फसल है जिसकी मांग हर मंडी में साल भर रहती है। पिछले साल करेले ने किसानों को सबसे ज्यादा मुनाफा दिया था। जनवरी-फरवरी में लगा हुआ करेला शुरुआती दौर में ६०-७० रुपये किलो तक बिक सकता है, जो बाद में भी ३०-४० रुपये से नीचे नहीं जाता।
लोबिया एक ऐसी सब्जी है जिसका थोक भाव मंडियों में कभी भी ५० रुपये किलो से कम नहीं देखा जाता। इसे किसान मुख्य फसल के तौर पर या अन्य फसलों के साथ ‘इंटरक्रॉपिंग’ (Intercropping) के रूप में भी लगा सकते हैं। जनवरी के अंत में लगाई गई लोबिया की फसल साल भर में सबसे अधिक भाव दिलाती है। यह कम समय में तैयार होने वाली और अधिक उत्पादन देने वाली चुनिंदा फसलों में से एक है।
सब्जी उत्पादन में सफलता पाने के लिए विशेषज्ञों ने खेत की अच्छी तैयारी पर जोर दिया है। बुवाई से पहले खेत की गहरी जुताई, प्रचुर मात्रा में देसी खाद (गोबर खाद) और संतुलित रासायनिक खादों का प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ ही, खरपतवार नियंत्रण और समय-समय पर कीटनाशकों व फफूंदनाशकों का छिड़काव फसल की आयु बढ़ाता है। किसान जितनी लंबी अवधि तक फसल चलाएंगे, उनका मुनाफा उतना ही अधिक होगा।